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मेरा पहला हॉस्टल..!!!

hostel

जिंदगी की कुछ बातें या कुछ ऐसे पल होते है जो हम कभी नहीं भूल सकते , आज भी हम अगर याद करे तो तो सामने ही सब दिख जाता है |

ऐसा ही एक टाइम था जब मुझे मास्टर्स की पढ़ाई के लिए अपने शहर से दूसरे शहर हरिद्वार जाना था |

मन मैं ख़ुशी भी थी की कॉम्पिटिटिव एक्साम्स क्लियर करके मुझे एडमिशन मिला था पर घर से कभी दूर नहीं रही थी तो थोड़ा अलग रहने का दुःख भी था| उसी तरह घर वाले भी खुश थे पर मैं घर से दूर कैसे रहूंगी उनको उसकी फ़िक्र भी थी | 

हमने पहले ही हॉस्टल बुक कर लिया था, २ दिन बाद कॉलेज खुलने वाले थे इसलिए मुझे कल हॉस्टल के लिए निकलना था | घर पर सब कुछ ना कुछ काम में लगे थे मम्मी मेरे लिए खाने का सामान बनाने में बिजी थी , पापा सामान ली लिस्ट चेक करने में और मेरा छोटा भाई खुश था की अब वो अकेले घर पर राज़ करेगा , जहा तक मैं जानती हूँ वो सोच रहा होगा की दीदी चली जाएगी तो स्कूल का असाइनमेंट या प्रोजेक्ट कौन बनाएगा |

घर पर कुछ दिन से मेरे ही पसंद की चीज़े लायी या बनायीं जा रही थी | रात को पापा ने सब चेकलिस्ट चेक करी ताकि मैं कुछ जरुरत का सामान ना भूल जाऊ | सुबह अर्ली मॉर्निंग की बस थी ,पापा मुझे छोड़ने गए तब तक तो मैं बहुत खुश थी की अब हॉस्टल में रहूंगी ऐसा करुँगी वैसा करुँगी | जब स्कूल मैं पढ़ती थी तो सोचा करती थी की अच्छे से कॉलेज में पढूंगी और हॉस्टल में रहूंगी | तो वही  सब मेरे दिमाग में भी चल रहा था | 

पर यह क्या जितना हॉस्टल पास आ रहा था उतना ही घर दूर जा रहा था , अब तो मैं सोचने लग गयी की कैसे रहूंगी हॉस्टल में ,कैसे दोस्त मिलेंगे ,ना जाने रैगिंग होगी तो क्या होगा ऐसे ही बहुत सारे सवाल एक के बाद मेरे दिमाग में आ रहे थे |

हमारा सफर भी पूरा हो गया और हम हरिद्वार पहुंच गए हॉस्टल में एंटर हुए |

हॉस्टल की केयर टेकर ने सारे रूल्स समझाए ,खाने कब कब मिलता है जो भी चीज़े जरुरी होती है वो सब बता दिया था और फिर मुझे मेरा रूम दिखाया | पापा ने सारा सामान रूम में रखा ,थोड़ी देर मुझसे बातें की फिर पापा को भी वापस घर जाना था | हॉस्टल में तब एक या दो लड़किया ही आयी हुए थी |

 पापा घर के लिए निकल ने लगे , मुझे आज भी याद है एक अजीब सा दुःख था मुझे छत से पापा को बाई कर रही थी मैं आंखे थोड़ा नम भी थी | धीरे धीरे हॉस्टल में और लड़किया भी आ गयी थी मेरी रूम में भी एक लड़की आगयी थी | थोड़ी बातें हुए दोस्ती हुए और ऐसे ही रात हो गयी , फिर हॉस्टल की सारी लड़किया डिनर पर मिली ,किसी से पहले दिन ही पक्की वाली दोस्ती हो गयी थी |

मुझे घरवालों की याद जरूर आ रही थी किन्तु होस्टल में अच्छा भी लग रहा था ।हौस्टल का रहना बहुत ही अलग किस्म का होता है घरवालों से दूर रहना पड़ता है । अपने सब काम खुद करने पढ़ते है , खाना अच्छा लगे या ना लगे खाना ही पढता है | वो घर नहीं है जहा मम्मी होती है धीरे धीरे यह समझ आने लगता है | पर अब हॉस्टल में भी एडजस्ट हो गए थे शायद इसलिए क्यूंकि वह हमे दोस्त मिल गए थे |

घर वालो के बाद वो दोस्त ही है जो किसी भी चीज़ की कमी नहीं होने देते | वहा की दोस्ती आज भी है याद है जो हॉस्टल के पहले दिन ही बन हो गयी थी |

 हॉस्टल का पहला दिन और वो पहले दिन वाले पक्के दोस्त |

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