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पंद्रह साल पहले का ब्लाउज...!!!

 सुनो क्यों न फिर से पंद्रह साल पहले की तरह इस बार अपनी एनिवर्सरी मनाये, उस समय के संगीत से आज की महफ़िल सजाये - मैंने पूछा  पति देव ने मुस्कराते हुए बोला- अरे वाह नेकी और पूछ,हाँ हाँ पुरानी यादें भी ताज़ा हो जाएँगी।  ठीक है मैं भी तैयारी करती हूँ सब कुछ की लिस्ट बना लेती हूँ और दोस्तों को भी इनविटेशन भेज देती हूँ - मैंने बोला।  हाँ ठीक है मुझे भी भी बता देना की क्या क्या करना है मैं सारा सामान ले आऊंगा - पति देव ने कहा।  मैं बोली ठीक है। और अपने काम में लग गयी।  तभी बहार जाते हुए पति देव ने बड़े प्यार से बोले - सुनो जो साड़ी मैंने तुम्हे गिफ्ट की थी पहेली एनिवर्सरी पर वही पहनना ।  मैंने भी बोल दिया हाँ ठीक है।  जल्दी में यह भूल ही गयी की वो साड़ी वह गिफ्ट तो पंद्रह साल पहले मिला था अब तो मैं बहुत मोटी हो गयी हूँ, और इतने टाइम से वो साड़ी पहनी ही नहीं है ।  सोचा एक बार क्यों न चेक कर लू (हम मोटे हो भी जाते है पर हमे लगता नहीं है ) साड़ी का क्या है वो तो सदाबहार होती है किसी को भी आजाती है असली तो ब्लाउज होता...

जिंदगी के पड़ाव हमे हर माहौल में जीना सीखा देते है...!!!

 जिंदगी के पड़ाव ,कुछ बड़े कुछ छोटे पर हर पड़ाव कुछ ना कुछ सीखा जाता है या हमे मजबूत बना जाता है। यह कहानी भी हर लड़की की जिंदगी से जुडी हुए है। तो चलिए शुरू करते है।  देहरादून की अंजलि का आज २५ वर्षीय की हो गयी थी हर लड़की की तरह उसके भी सपने थे की वो नौकरी करेगी अपने पैरो पर खड़ी हो आत्मनिर्भय बनेगी।  पर जिस तरह लड़की के अपने सपने होते है उसी तरह लड़की के माँ बाप के भी सपने होते है की लड़की का घर बस जाये। लड़की जैसे ही बड़ी होती है माँ बाप उसके हाथ पिले करने की सोचने लगते है।  अंजलि वैसे हर काम में अच्छी थी चाहे वो पढ़ाई हो या घर का काम , व्यवहार में भी उसका को तोड़ नहीं था पर बस उसके कुछ सपने थे जो वो पूरा करना चाहती थी।  अंजलि और अंजलि की माँ चाय पी रहे थे तभी फ़ोन की घंटी बजी दूसरी तरफ अंजलि की बुआ थी हालचाल पूछने के बाद बुआ ने अपने जानने वालो में एक लड़के के बारे में बताया, विवेक लड़का सरकारी नौकरी में है आदत का भी सही है और सबसे अच्छी बात की वो विवेक  हमारे जानने वालो में से ही है यह सुनकर अंजलि की माँ खुश हो गयी और बात आगे बढ...

पर माँ हम ही क्यों ?

 हर किसी की जिंदगी में बहुत सारे छोटे बड़े पड़ाव जरूर आते है , कुछ पड़ाव हमे याद नहीं रहते और कुछ पड़ाव हमारी जिंदगी बदल देते है। ऐसी ही एक कहानी है सीमा की , कक्षा नौ में आगयी थी इस साल।  पढ़ाई में भी वो अच्छा कर रही थी हॅसमुख स्वाभाव की थी सीमा।  उसकी बातें सबका मान मोह लेती थी।  शरारते भी वो बहुत करती थी इधर से उधर फुदकते ही रहती थी , माँ उसको कितना समझाती की अब बड़ी हो गयी है थोड़ा घर का काम सीख ले या यह उछलना कूदना थोड़ा काम कर पर सीमा किसी की भी नहीं सुनती थी।  ऐसे ही सीमा के साथ वक़्त भी बढ़ रहा था यह वक़्त वो वक़्त था जब हर लड़की के जीवन में आते है , जब लड़की के शरीर के कुछ अंग में बदलाव आता है।  ऐसा बदलाव तो उस वक़्त समझना बहुत ही मुश्किल है , या सच कहे तो उस बदलाव को समझाने वाला ही कोई नहीं होता।  सीमा के शरीर में भी बदलाव आ रहे थे वो अब एक बच्ची से युवा होने जा रही थी।  पर उसको इस महत्यपूर्ण पड़ाव के बारे में नहीं पता था वो अपने ही शरीर से नफरत करने लगी थी।  सीमा को खुद का ही सीना बढ़ता हुआ दिख रहा था , ऐसा...

क्या हम दहेज़ से आज़ाद है

जितना अच्छा घर उतना ही आजकल दहेज़ भी देना पड़ेगा| इतना पैसा पढ़ाई में क्यों खर्च करना , कुछ घर के काम सिखाओ वही ससुराल में काम आएंगे | ऐसी बातें श्याम को रोज़ सुन्नी पढ़ती थी , शायद यह बातें हर बेटी के पिता ने जरूर सुनी होगी | बेटी का जनम हुआ नहीं की आसपास के लोग या रिश्तेदार उसके दहेज़ का सोचना शरू कर देते है | बेटी की पढ़ाई, उसका स्वास्थ या उसका भविष्य कैसा होना है यह नहीं सोचता कोई | श्याम के साथ साथ यह बातें हर वक़्त उसकी बेटी रिया को भी सुनाई देती थी ,एक डर था उसको की यह शादी ही क्यों करनी जिसमे रिश्तो को किसी सामान या पैसो से पक्का किया जाता है |  पर माँ बाप के संस्कारों  के कारण वो कभी भी किसी से न ऊंची आवाज में बात करती थी न ही कभी किसी का अपमान करती थी | धीरे धीरे श्याम ने भी रिया के लिए रिश्ते देखने शुरू कर दिए और देखते ही देखते उनको एक अच्छा रिश्ता मिल गया | लड़के वाले घर पर रिया को देखने आये रिया उनको बहुत पसंद आगयी | बात पक्की हो गयी सबने एक दूसरे से पूछा किसी को कुछ कहना है वो अभी बोल दे ताकी सारे बातें पहले ही साफ़ रहे | स...

खोकली सोच

देश को आज़ाद हुए आज ७४ साल हो गए ,यह वो आज़ादी थी जो सबने मिलकर ,जान पर खेल कर हमे दिलाई थी।  पर क्या हमने अपने अंदर पल रहे भावनाओ को आज़ाद किया है ? क्या यह धर्म के भेदभाव से हमे आज़ादी मिलेगी ?  क्या हमे शरीर के रंग को नाप टोल करने से आज़ादी मिलेगी ?  क्या हम ऐसी आज़ादी देख पायंगे जिसमे सब एक हो, जब कोई सड़क पर जख्मी पड़ा हो तो उसको सहारा देने की आज़ादी हो यह नहीं की धर्म बंदिशों में बन्द जाये।  अरे यह मत करो लोग क्या कहेंगे। जाने कब हम उन अनदेखे लोगो से आज़ाद होंगे जिनको हमने कभी देखा नहीं फिर भी उन के डर से आज़ाद नहीं है हम।  लोगो की मानसिकता को आज़ाद होने की जरुरत है, रंग, धर्म यह सब से आज़ाद होने की जरुरत है।  असली आज़ादी जिसमे पहले की तरह सबके लिए सम्मान हो। जिसमे प्यार हो, जहा पूरा देश अलग नहीं एक परिवार हो।  जहा अगर किसी लड़की को कोई तकलीफ हो तो अपनी बहन या दोस्त समझ कर उसका साथ दो यह नहीं की उसका तमाशा तुम भी अजनबी की तरह देखो।  ऐसी आज़ादी ला दो की अगर घर से किसी की बच्ची निकले तो उसको यह भरोसा हो की...

तुम्हारे पंख तुम्हारे पास है

सीमा की कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो गयी थी ,उसको अब अपने सपने पुरे करने थे पर हर परिवार की तरह उसकी  परिवार वाले भी उसकी शादी की बात चला रहे थे। यहाँ सीमा ने अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए त्यारी शरू कर दी वही दूसरी तरफ सीमा के घर वालो ने सीमा के लिए एक अच्छा रिश्ता ढूंढ लिया।  सीमा के घर वालो ने सीमा को यह बात बताई , जिसे सुन सीमा बहुत दुखी हो गयी।  अपने माँ बाबा से भी वो कुछ नहीं बोलना चाहती थी क्यूंकि वो जानती थी की उसको उसके माँ बाबा ने किस तरह पला है। मध्यवर्गी परिवार जनता है की किस तरह पैसे बचा बचा कर घर चलाया करते है , सीमा को भी अपने घर की इस्तिथि पता थी फिर भी उसके माँ बाबा ने कभी सीमा को पढ़ने से नहीं रोका।  सीमा ने अपना मान मार के शादी के लिए हाँ कर दी।  फिर क्या लड़के वाले सीमा को देखने आए और रिश्ता पक्का हो गया। सीमा ने दिल को मन लिया था की अब यही उसके लिए ठीक है पर वो दिल से खुश नहीं थी। देखते देखते शादी का दिन भी आ गया और सीमा की शादी भी हो गयी।  रस्मो रिवाज होने के कुछ दिन बाद ही सीमा को पुरे परिवार को जानने का समय मिला...

जिंदगी में हारना नहीं है...||

पापा शौर्यपूण गीत प्रतियोगिता में भाग ले लिया पर कौनसा गीत गाऊ, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।  पापा बोले परेशान न हो सब हो जायेगा।  मैं टूशन से आयी तो मेरा गीत पापा ने टेप रोक रोक कर कागज़ पर लिख लिया था।  मैंने भी पापा का इतना साथ पाकर दिल से गाने की तैयारी की और उस शौर्यपूण प्रतियोगिता में मुझे दूसरा इस्थान मिला।  उस दिन पापा ने मुझे यह सिखाया की कुछ भी क्यों न हो जिंदगी में हारना नहीं है, एक बार कोशिश जरूर करना।

पापा ऐसे ही होते है..|||

मेरी तबियत ख़राब हुई और मुझे कम्पलीट बेडरेस्ट बोल दिया गया।  मैं तो बेडरेस्ट कर लू पर बच्चो को कौन संभालेगा,बच्चो को खाना खिलाना, खेल वगेरा सब कौन करेगा।इसी सोच मैं रात को सो गई |  सुबह थोड़ा लेट उठी तो देखा बच्चो ने सुबह का दूध पी लिया है और नास्ता तैयार हो चूका है।  आज तो बच्चो के पापा ने पूरी ज़िम्मेदारी के साथ सब काम संभाल लिया है | यह देख एक तस्सली सी हुई, दिखाते नहीं है पर हर ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाते है| पापा ऐसे ही होते है |

अभिमान..||

पापा एक चटान की तरह होते है, जो मजबूती के साथ परिवार को संभाले रखते है।  पापा बोलते कम है पर समझ सब जाते है।  कुछ भी मुश्किल हो, साथ हमेशा नज़र आते है। हम कभी कमजोर न पड़े इसलिए, वो खुद को बहुत कठोर दिखते है।  हम टूटेंगे, रोयेंगे या नाराज हो जायेंगे,  हम जानते है आप है जो हमे मनाएंगे।  यह तो हमने बचपन से ही देखा और जाना है 

मेरा रेड गाउन..!!

चारो तरफ चैंका चोद रौशनी और लोगो की भीड़ जमा थी , हर कोई हमारे साथ सेल्फी लेना चाहता था।   मीडिया वाले भी लाइन से खड़े थे,यह सब देख कर सुमित की सात साल पहले की बात याद आगयी। सुमित ने मुझसे कहा था की बस कुछ साल की मेहनत है और मेरा पूरा सपोर्ट चाहिए क्यूंकि शायद यह साल मैं तुम्हे वक़्त कम दू या कभी कभी मैं इतना बिजी रहू की बहुत सी चीज़े भूल जाऊ , बस तुम्हारे साथ की जरुरत है।  मैंने भी एकदम से बोला मेरा साथ हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा और वक़्त न दे पाओ तब भी मैं तुम्हारे साथ ही खड़ी होंगी जैसे मैं शादी से पहले थी।  जब हमारी शादी नहीं हुए थी तब मेरे सब दोस्त जिनका अफेयर था रोज़ अपने साथी के साथ बहार घूमते थे , तब मैं सुमित से बहुत गुस्सा होती थी की तुम मुझे टाइम नहीं देते , मेरे साथ टाइम नहीं बिताते।  और सुमित बस यही बोलते थे की मुझे कुछ साल दो फिर जिंदगी भर साथ में आराम से घूमेंगे।  सुमित बोलते थे की मैं कुछ बनना चाहता हूँ जिससे मैं घर वालो और तुम्हारे सारे इच्छाएं पूरी कर सकू। उस टाइम भी मैंने सुमित की बात में सहमति दी थी और पूर...

छोटे से डिब्बे में दो दिल..!!

माँ के लिए उसकी हर प्रेगनेंसी बहुत ही यादगार होती है। उसी तरह मेरे लिए भी मेरी दोनों प्रेगनेंसी की यादें आज भी ताज़ा है, किस तरह मुझे अपनी पहेली प्रेगनेंसी का इंतज़ार था।  इतने साल कोशिश के बाद भी मेरी गोद नहीं भरी थी पर कहते है न भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं।   मुझे शादी के ३ साल बाद माँ बनने का सौभाग्य मिला और फिर तो जिंदगी में खुसियो की बहार ही आगयी।  पर कहानी शरू होती है मेरी दूसरी प्रेगनेंसी की - मैंने शरू से ही सोच रखा था की बच्चे दो ही करूंगी ताकि उनको ए...

भगवान का दिया हुआ सबसे बड़े दर्जे का हिस्सा..!!!

पुरे प्रेगनेंसी के मेरे ९ महीने अच्छे से निकल गए अब आया टाइम डिलीवरी का।  डॉक्टर ने १२ अगस्त की तारीक दी थी तो १२ तारीख का बेसब्री से इंतज़ार था सब तैयारी कर ली थी।  १२ तारीक आयी और चली गयी पर कुछ नहीं हुआ १३ भी गयी और १४ तारीक आ गयी मैं शाम को अपनी सासु माँ के साथ शॉपिंग पर निकल गयी।   शॉपिंग करते हुए ही मुझे डॉक्टर का फ़ोन आया की आपकी डिलीवरी डेट १२ थी पर आज १४ हो गयी है आपको आज एडमिट होना पड़ेगा हम आज आपको पैन इन्दुस करेंगे। अचानक से यह सुन थोड़ा मैं घबरा सी गयी पर डिलीवरी तो होनी ही थी।   हम शॉपिंग से वापस घर पहुंचे, खाना वगेरा सब निपटा के मैं और सुमित हॉस्पिटल की तरफ चल दिए।  हॉस्पिटल पहुंचे सब फॉर्मलिटीज कर एडमिट हो गयी , नर्स आयी और मुझे कुछ इन्दुस के इंजेक्शन लगाके बोलने लगी की अभी आराम कर लो कल का दिन बहुत लम्बा जायेगा।   पर मुझे नींद ही नहीं आयी कुछ दर्द में ही मुझे पेट में दर्द होने लगा , डॉक्टर  को बताया तो वो बोली आपका delivery का टाइम आ गया है।   और मुझे डिलीवरी  रूम की तरफ ले गए।  ...

वो मम मम की आवाज..!!

अपने भी बेसब्री से इंतज़ार किया होगा अपने बच्चे के मुँह से "माँ" सुनने के लिए , है ना ? हर माँ इंतज़ार करती है उस अनमोल पल का की बच्चा उसको अपनी प्यारी सी आवाज मे माँ कहकर बुलाये चाहे वो मम हो, मम्मी हो या माँ हो।  कितना अद्भुत होता है वो पल भी , हम बच्चे के होते ही माँ तो बन जाते है पर उस बच्चे के मुँह से माँ सुनने के लिए हमे कुछ महीने इंतज़ार करना पढता है | किसी का इंतज़ार ज्यादा होता है किसी का कम पर हम माये उस पल के लिए इंतज़ार करती है | हम औरते होती ही है ऐसी कुछ, माँ तो हम बच्चे के कोख में आते ही बन जाते है पर उस बच्चे का ९ महीने इंतज़ार करते है | इसके बाद से ही हमारी इंतज़ार करने की एक आदत सी हो जाती है ,अपने बच्चे की पहली मुस्कान,उसके पहले दो दांत , उसका पहली बार चलना , उसका पहली बार हाथ पकड़ना और उसका वो पहली बार माँ बोलना | ऐसे ही कई बातें है जो माँ बनने के बाद हर रोज़ हम महसूस करते है ,कुछ एहसास तो हम बया कर सकते है पर कुछ एहसास तो दिल में बस गए है जिनको  जितना  भी बया करो हम समझा नहीं सकते | मैंने भी हर छोटे छोटे एहसासो को खुशियों की तर...

वो डबल लाइन्स...!!

माँ बनने के बाद के सब पल यादगार ही होते है, हर माँ के लिए वो पल किसी अनमोल यादो से कम नहीं होते है | ऐसी ही कुछ यादो के पल मेरे भी है वो पहले पल जो आज भी अगर सोचने बैठ जाऊ तो मेरा मन खुश हो जाता है | शादी को तीन साल हो चुके थे पर अभी तक भगवान ने मुझे माँ बनने के ताज से सवारा नहीं था | मेरे साथ के ज्यादातर लोगो के बच्चे हो गए थे या होने वाले थे, मुझे अंदर से बहुत दुःख होता था एक अलग सा एहसास की मुझे यह ख़ुशी क्यों नहीं मिल रही | मैं अपने साथ के लोगो के बच्चो के साथ ही पूरा दिन बिताती थी बच्चो के साथ एक सुकून सा मिलता था मुझे , खुद का बच्चा नहीं होने की कमी नहीं लगती थी मुझे | पर कहते है न की भगवान के घर देर है पर अँधेर नहीं || हर महीने मैं उम्मीद रखती की इस  बार तो मुझे ही ख़ुशीखबर मिलेगी पर दिल टूट जाता | कितनी बार तो मैंने घर पर ही प्रेगनेंसी टेस्ट भी किये की क्या पता इसमें वो डबल लाइन दिख जाये पर इतने साल से कुछ नहीं हुआ| फिर भी हर महीने उम्मीद लगाए रखती थी क्या करे दिल मानता ही नहीं था | एक दिन मुझे अपनी तबियत थोड़ा ठीक नहीं लगी, फिर मैंने सोच...

मेरी अतरंगी यात्रा..!!

मेरी पहली  अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा आज भी यादगार है हलाकि वो मुझे याद ही नहीं , पूछो ऐसा कैसे हो सकता है की मुझे अपनी हवाई यात्रा याद ना हो ?  तो सुनिए बात है करीब ८ साल पहले की , शादी के ठीक ६ दिन बाद हमे (मेरे पति सुमित और मुझे ) एक दूसरे देश के लिए निकलना था।  पति देव की अमेरिका में नौकरी लगी थी , अपने देश से इतने दूर जाना ही दिल में थोड़ा हलचल मचा रही थी।  कैसे कर पाऊँगी मैं वहा अपने देश जैसा होगा क्या वो देश भी, हर वक़्त मैं यही सोचती थी।  आखिर वो दिन आ गया सुबह से ही सब घर वाले हमारे विदाई के काम में लगे हुए थे।  हमारे घर से हवाई अड्डा करीब २०० किलोमीटर लगभग ७ से ८ घंटे का रास्ता, तो घर के हर सदस्य हमे हवाई अड्डा छोड़ने आये।  हम समय से हवाई अड्डा पहुंच गए थे फिर हमने सबसे मिलना किया थोड़े भावुक हुए और टा टा करते हुए हवाई अड्डे की ओर चल दिए।  अंदर जाकर बोर्डिंग पास लिए और अपने ज़हाज़ की तरफ चल दिए।  हमारा बिज़नेस क्लास का टिकट बुक हुआ था तो हम उत्साहित भी थे और मेरी तो यह पहेली  अंतर्राष्ट्रीय ...

800 मीटर की रेस..!!

बात उन दिनों की है जब मैं 9th क्लास में थी और स्कूल में स्पोर्ट्स के लिए बच्चो को अंडर १६ और १९ के लिए सेलेक्ट कर रहे थे, मैंने सोचा की क्यों न स्पोर्ट्स में भी टॉय किया जाये, ज्यादा से ज्यादा कोई रैंक नहीं ला पाऊँगी पर कोशिश करती हूँ और इसी बहाने किसी और शहर में घूमने को भी मिलेगा।  तो क्या हम चल दिए टीचर के पास मुँह उठाके, किसी से कम थोड़ी है हम भी।  टीचर को शॉट पुट में और लॉन्ग जम्प में अपना नाम लिखने को बोल दिया और फिर हम सब लोग प्रैक्टिस में लग गए।   अब तो क्लासेज भी बँक करने लगे यह बोलकर की सर प्रैक्टिस करनी है , सर लोग भी कुछ नहीं बोल सकते थे क्यूंकि हम सच में प्रैक्टिस करते थे।  एक दिन टीचर बोली की कोई भी ४०० मीटर और ८०० मीटर रेस में नहीं है , किसी को बोलो की नाम दे पर कोई रेडी ही नहीं हुआ।  टीचर को भी हर फील्ड में बच्चो के नाम देने थे तो उन्होंने हमसे कहा कोई रेडी नहीं हुआ बस एक मैं थी जिसने टीचर को बोला मेरा नाम लिख दीजिये।  घर आकर पापा मम्मी को बताया तो वो बोले ३ या ४ दिन में कैसे होगी प्रैक्टिस, रेस में लिया है उसके लिए...

वो १५ हज़ार रुपये..!!

देखते देखते कॉलेज भी पूरा हो गया, अब एक अच्छी सी नौकरी की तलाश थी | आगे अभी और पढ़ना था पर सोचा की जब तक एम बी ए की पढ़ाई शरू नहीं होती क्यों ना कोई नौकरी ढूंढ ली जाये | थोड़ा पॉकेट मनी का काम हो जायेगा | किस्मत अच्छी थी ४ - ५ दिनों की खोज मैं एक नौकरी मिल गयी| मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, मैं वहा टाइम से पहुंच गयी | वहा कोई भी नहीं था और वो ऑफिस ही २ कमरों का था ,पहले सोचा की वापस जाती हूँ फिर लगा की आयी हूँ तो देखती हूँ क्या होता है | इंटरव्यू स्टार्ट हुआ ,एक सर आये और उन्होंने बताया की मेरा ही यह ऑफिस है और मैं अकेले ही काम करता हूँ एक हेल्पर है जो पेपर प्रिंट वगेरा करता है ,पर मुझे कोई पढ़ा लिखा चाहिए जो इंग्लिश में मेल वगेरा कर सके |  मैंने बोला की हाँ वो तो मैं कर सकती हूँ फिर बोले की सैलरी ज्यादा नहीं होगी क्यूंकि अभी ही ऑफिस स्टार्ट किया है पर ऑफिस में अगर काम ख़तम तो तुम किसी टाइम भी जा सकती हो ,जरुरी नहीं की पूरा ८ घंटा ही दो |  जब भी काम ख़तम तुम घर के लिए जा सकती हो और अगर तुमने कुछ नहीं डीलर कंपनी में ऐड किये तो उश्के ल...

मेरा पहला हॉस्टल..!!!

जिंदगी की कुछ बातें या कुछ ऐसे पल होते है जो हम कभी नहीं भूल सकते , आज भी हम अगर याद करे तो तो सामने ही सब दिख जाता है | ऐसा ही एक टाइम था जब मुझे मास्टर्स की पढ़ाई के लिए अपने शहर से दूसरे शहर हरिद्वार जाना था | मन मैं ख़ुशी भी थी की कॉम्पिटिटिव एक्साम्स क्लियर करके मुझे एडमिशन मिला था पर घर से कभी दूर नहीं रही थी तो थोड़ा अलग रहने का दुःख भी था| उसी तरह घर वाले भी खुश थे पर मैं घर से दूर कैसे रहूंगी उनको उसकी फ़िक्र भी थी |  हमने पहले ही हॉस्टल बुक कर लिया था, २ दिन बाद कॉलेज खुलने वाले थे इसलिए मुझे कल हॉस्टल के लिए निकलना था | घर पर सब कुछ ना कुछ काम में लगे थे मम्मी मेरे लिए खाने का सामान बनाने में बिजी थी , पापा सामान ली लिस्ट चेक करने में और मेरा छोटा भाई खुश था की अब वो अकेले घर पर राज़ करेगा , जहा तक मैं जानती हूँ वो सोच रहा होगा की दीदी चली जाएगी तो स्कूल का असाइनमेंट या प्रोजेक्ट कौन बनाएगा | घर पर कुछ दिन से मेरे ही पसंद की चीज़े लायी या बनायीं जा रही थी | रात को पापा ने सब चेकलिस्ट चेक करी ताकि मैं कुछ जरुरत का सामान ना भूल जाऊ | सुबह अर्ली मॉर्नि...

मेरा पहला कंप्यूटर..!!

समय तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और समय के साथ साथ नयी नयी टेक्नोलॉजी भी आ रही है | यह कहानी तब की है जब मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर के बारे में सुनने को मिल रहा था,लैंडलाइन का जमाना था वो | मोबाइल होना तो एक सपने जैसा था उसी तरह तब कंप्यूटर चर्चा में था की कंप्यूटर में हम सब कुछ कर सकते है, कंप्यूटर में हम टाइपिंग ड्राइंग, इंटरनेट सर्फिंग और मूवीज या सांग्स भी सुन और देख सकते है या तो नेट पर या सी डी लगा कर | उस समय यह सुनना ही बहुत चौकाने वाली बात थी की ऐसा भी हो सकता है एक कंप्यूटर पर हम इतना कुछ कर सकते है |  हमे तो बस ऊपर ऊपर की बात ही पता थी यह तो पता ही नहीं था की कंप्यूटर इससे भी ज्यादा बहुत कुछ कर सकता है | हर तरफ से कंप्यूटर की ही बातें होती थी हमारे स्कूल में कंप्यूटर की क्लास भी स्टार्ट हो गयी थी, उस क्लास मैं हम सब बच्चे कंप्यूटर पर कलरिंग करते थे | सबको कंप्यूटर बड़ा पसंद आने लगा था और आये भी क्यों नहीं एक कंप्यूटर के इतने फायदे भी तो थे | मैंने भी कंप्यूटर लेने की बात अपने पापा के सामने रखी, उनको बोला की कंप्यूटर से मैं घर पर ही पढ़ लुंगी, टाइप...